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Monday, 19 June 2017

होसलों और उम्मीदों

मैं सागर की रेत, तुम सागर की लहर
मैं होंसलों और उम्मीदों से
सागर की रेत से घर बनाती हूँ

और तुम हमेशा की तरह
मेरे होसलों और उम्मीदों से बने घर को
हर बार की तरह तोड़ कर चले जाते हो


शीरीं “तस्कीन”

6 comments:

  1. नमस्ते, आपकी यह रचना गुरुवार 22 -06 -2017 को "पाँच लिंकों का आनंद " http://halchalwith5links.blogspot.in में लिंक की गयी है। चर्चा के लिए आप भी आइयेगा ,आप सादर आमंत्रित हैं।

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    1. तहे दिल से आपका शुक्रिया श्रीमान जी

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  2. Replies
    1. धन्यवाद आदरणीय लोकेश नदीश जी

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  3. बहुत सुंदर...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय सुधा देवरानी जी

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